बाग
वो फूलों से नहीं रिझनेंवाले,जिनके कभी बाग रहें हैं।
तुमसे मिलना इस दुनियाँ में,पर मेरे सौभाग्य रहें हैं।
जर्रा_जर्रा आजमाया गया हैं,बातों से तो"कभी हाथों से;
जो पत्थर थे तराशे गए हैं,और चांद में भी दाग रहें हैं।
शब्दों की तासीर रहीं हैं,वक्त के हिसाब से बदलती हैं;
पर जब तक तेरे साथ रहें हैं,ख्वाबों के सब्जबाग रहें हैं।
और तुम उनसे मेरी खबर लेना,जहां बचपन मेरा बीता हो;
दुनियां में उतनी आग नहीं,मेरे सीने में जितनी आग रहें हैं।
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