नाज

 यूं तो खाली हैं हम,अब दिल को लगानें के लिए।

मगर कौन आएगा नाज़,समंदर का उठाने के लिए।


और हमको किसी के सांचे में नहीं,अब ढलना हैं;

इश्क हैं तो स्वीकारों,जैसे भी हो ज़माने के लिए।


गर बगावत करने पे आए,तो"इतिहास बदल देंगे;

तुम हमें न उकसाओ,पत्थर को उठाने के लिए।


और किसी के शक्शीयत पर,सवाल ऐसे न उठाओ;

इक लम्हा भी काफ़ी हैं,दुनियां पे छा जाने के लिए।


माना लकीर खींचकर,रिश्ते तो नहीं बनाए जातें;

तुम कहो,तो"हद से गुज़र जायेंगे,तुम्हें पाने के लिए।

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