बाजार
चंद खोटें सिक्के क्या जो बाज़ार में आ गए हैं।
सुना हैं की वो भी,अब इश्तहार में आ गए हैं।
और वो अपनी कीमत, हमें कुछ ऐसे बताता हैं;,
लगता हैं दो कौड़ी के लोग,व्यापार में आ गए हैं।
इक कंचन सी काया,जुल्फें भी संवारी गई थी;
हमनें तारीफ़ की,तो"कहा की प्यार में आ गए हैं।
इक उम्र तक जिन्होंने,हिराकत से देखा हैं हमें;
हैसियत क्या बदलीं,वो भी सरोकार में आ गए हैं।
जितनेंं लुच्चें थे,अब बाजार में दिखतें ही नहीं;
जो चुनाव आया था,सभी सरकार में आ गए हैं।
कल तक दिलों जां थे जो,अब नज़र मिलातें नहीं,
साहेब बन गए हैं,जबसे वो कार में आ गए हैं।
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