नयन

 नाशाद होकर भी,मेरे नयन देखतें हैं।

हम आज भी तुम्हारें,सपन देखतें हैं।


इस मलाल में,अब जिंदगी गुजरती हैं;

के अब दूसरे भी तुझको,नग्न देखतें हैं।


और कितना खोया हूं,मैं तुम्हें खोकर;

देखनेवालें भी मेरा,यहां जतन देखतें हैं।


नए लोगों की पहचान तुमको कहां हैं;

लोग इश्क़ में सिर्फ,अब"बदन देखतें हैं।


उन्हें दौलत भी चाहिए,और शोहरत भी;

जो कहते कभी थे,के हम मन देखते हैं।


इश्क़ हुआ भी,और जो इश्क़ के भी न हुए;

दोष ऐसे लोगो का सीधे,भगवन देखतें हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मरहम

सौभाग्य

उन्वान