अमरूद

 घर छूटा तो आंगन छूटा,खत्म हुए वजूद हमारे आंगन के।

पूरे गांव मशहूर थे साहेब,कभी अमरूद हमारे आंगन के।


माना आज बिखरे हुए हैं, कोई यहां गया,कोई वहां गया;

थी गांव की सरपंची न बदली,बावजूद हमारे आंगन के।


क्या क्या छीना शहर ने,आज बोला"गांव का आंगन मुझसे;

पंछी छज्जर छोड़ गए हैं,गाय,कुत्ते हैं बेसुध हमारे आंगन के।


दरवाजे का जमघट हैं छूटा,छूट गई बगल की बूढ़ी काकी;

बच्चें भी रहते है जैसे,हो खुद में"मशरूफ़ हमारे आंगन के।

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