पत्थर
यूं कुछ लोग,यहां"आजमानें में लगें हैं।
जैसे दिल को पत्थर,बनाने में लगें हैं।
अभी जो खोल से,बाहर नहीं निकलें;
वही चुजें हमें आंख,दिखानें में लगें हैं।
जिनमें साया_गाह,खुशबू भी नहीं कोई;
बस वही लोग औकाद बताने में लगें हैं।
जहां जिंदगी हमसें,जान छुड़ाने लगी हैं;
हम उसी दौड़ में,इश्क़ जताने में लगें हैं।
जो बच्चें कभी कौम को समझ नहीं पाए;
वही कौम के नाम पे"पत्थर उठानें में लगें हैं।
ये उलझन हैं,तुझे दे भी तो"सनम क्या दें;
कई चांद तो तेरे,ख़िदमत_खाने में लगें हैं।
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