जनाजा

 हैं यहीं वक्त का तकाज़ा,तो"तकाज़ा उठातें हैं।

आईए मिलजुल हम इश्क़ का,ज़नाज़ा उठातें हैं।


फ़रवरी रोजगार का मौसम नहीं,जो उन्माद में हैं;

अब बच्चें क़िताब छोड़कर,फूल ताज़ा उठाते हैं।


तुम्हारी उम्र हैं तुम भले खूब,यहां महबूब बनाओ;

हम घर के बड़े हैं,जिम्मेदारियों का ही मज़ा उठाते हैं।


मोहब्बत क्या ही भला करेंगे,अब इस दौड़ के बच्चें;

हम उस दौड़ के महबूब की,आजतक रज़ा उठातें हैं।


यक़ी मानिए असली मोहब्बत, होती इसी में हैं;

के हम पीछे चलते हैं,उनका आँचल,दुपट्टा उठातें हैं।

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