हिचकियां
तुम गए ऐसे जैसे,ले गया हो कोई
मेरा दिल,गुर्दा,मेरी अतरियां सारी।
और तेरी बेवफाई पे,जो चंद शेर पढ़े,
दाद देने लगी मुझे लड़कियां सारी।
इतना आसा नहीं हैं,तुम्हें भूलना सनम;
तुम्हें ढूंढने लगी हैं,मेरी हिचकियां सारी।
अब तो अपने घर में भी,ऐसे रहते हैं
घूरती है मुझे,दरवाजे खिड़कियां सारी।
जब तलक़ इश्क़ के मसलें से निकलते,
खत्म हो चुकी थी,सरकारी भर्तियां सारी।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें