सैलाब

 थे कचनार से,शोहराब से लोग।

थे उनके शहर सारे गुलाब से लोग।


जहां की मिट्टी भी खुशबूदार हो;

क्या बताए कैसे थे,महताब से लोग।


और उन्हीं में इक कली दिखाई दी;

जैसे बादलों में हो आफ़ताब से लोग।


मैं बस वही दोस्त,दिल हार आया था;

डूबे थे जिन आंखों के सैलाब से लोग।

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