तमाशा

 इश्क़ में हमसें,अब और तमाशा नहीं होगा।

सिर्फ कहने भर से,दिल को दिलासा नहीं होगा।


मैं ख़ुदा नहीं की,हर शय पे जोर"मेरा चलें;

मग़र हक़ीक़त हैं,फिर कोई तुझसा नहीं होगा।


यक़ीनन आईना ही,तेरी सूरत देखता होगा।

खुदा बनाए भी,तो फिर"तेरे जैसा नहीं होगा।


माना तेरे बग़ैर जीना,बहुत मुश्किल होगा;

मग़र इश्क़ में सागर,अब दरिया नहीं होगा।

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