खुसी भी बेच देता हैं,गम भी बेच देता हैं। हमे जख़्म देकर,अपना मरहम बेच देता है। मेरा पाला पड़ा है,ज़नाब' ऐसे शागिर्दों से☺️ रोज मिलकर,मेरा ओहदा-करम बेच देता हैं। बीमार हो तो,ये कोई नई बात नहीं गरीबी में; अब जिंदा है वही,जो अपना धर्म बेच देता हैं। ख़्याल किस-किस का करेगी,सियासत भला; साख पर पड़ती हैं,तो'वो भी वहम बेच देता हैं। खरीदार मिलतें कहाँ हैं, मुफ़्लिशी के दौर में; चालाकी उसकी है,करके बातें नरम बेच देता हैं। वो यूँ हराता है मुझें,यहाँ अपनी अदाओं से; साग़र को रोकर,अपनी आँखें नम बेच देता हैं। हाल वही होगा हमारा,जो औरों का हुआ हैं; काम चलता रहें,रोज सिस्टम भरम बेच देता हैं।
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