जुर्रत
कुछ भी होता,ऐसी भी जुर्रत नहीं करता।
मैं तुम्हें जानता,तो"तुमसे मोहब्बत नहीं करता।
मेरा गुरूर,तो"अब तेरी यहां कदमों में हैं।
खुद की इतनी भी,तो"फ़जीहत नहीं करता।
तू मोल न कर,तू जो चाहे"उसी मोल मुझे ले लें;
दाम घटाता भी,तो"कम इतनी कीमत नहीं करता।
माना तुम परेशा हो,तुमपर"जिम्मेदारियां भी हैं;
तो"ऐसे हालात में क्या,कोई मोहब्बत नहीं करता।
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