नज़र
भले आप लाख उड़े,लोगों की नज़र में नहीं हैं।
तक़ल्लुस ठीक कीजिए,आप बहर में नहीं हैं।
ये जो बेताब हैं,के घर का चिराग़ जल उठें;
जो चिराग़ जल गए,आज अपने घर में नहीं हैं।
और फ़िर गाँव चलिए,यही आख़िरी रास्ता हैं;
माना रौनकें बहुत हैं,मगर सुकून शहर में नहीं हैं।
दोस्त नाराज़ है,के उनके महबूब की ख़बर हैं हमें;
भला वो महबूब ही क्या,जो यहां ख़बर में नहीं हैं।
इक तू ही परेशा नहीं यहां,भला कौन आराम में हैं;
सफ़र में गर मैं हु,तो"यहां कौन सफ़र में नहीं हैं।
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