खुसी भी बेच देता हैं,गम भी बेच देता हैं। हमे जख़्म देकर,अपना मरहम बेच देता है। मेरा पाला पड़ा है,ज़नाब' ऐसे शागिर्दों से☺️ रोज मिलकर,मेरा ओहदा-करम बेच देता हैं। बीमार हो तो,ये कोई नई बात नहीं गरीबी में; अब जिंदा है वही,जो अपना धर्म बेच देता हैं। ख़्याल किस-किस का करेगी,सियासत भला; साख पर पड़ती हैं,तो'वो भी वहम बेच देता हैं। खरीदार मिलतें कहाँ हैं, मुफ़्लिशी के दौर में; चालाकी उसकी है,करके बातें नरम बेच देता हैं। वो यूँ हराता है मुझें,यहाँ अपनी अदाओं से; साग़र को रोकर,अपनी आँखें नम बेच देता हैं। हाल वही होगा हमारा,जो औरों का हुआ हैं; काम चलता रहें,रोज सिस्टम भरम बेच देता हैं।
वो फूलों से नहीं रिझनेंवाले,जिनके कभी बाग रहें हैं। तुमसे मिलना इस दुनियाँ में,पर मेरे सौभाग्य रहें हैं। जर्रा_जर्रा आजमाया गया हैं,बातों से तो"कभी हाथों से; जो पत्थर थे तराशे गए हैं,और चांद में भी दाग रहें हैं। शब्दों की तासीर रहीं हैं,वक्त के हिसाब से बदलती हैं; पर जब तक तेरे साथ रहें हैं,ख्वाबों के सब्जबाग रहें हैं। और तुम उनसे मेरी खबर लेना,जहां बचपन मेरा बीता हो; दुनियां में उतनी आग नहीं,मेरे सीने में जितनी आग रहें हैं।
दोस्तों की खातिर,अपनी सारी उन्वान देने वालें बच्चें। अब कहां मिलते हैं,मोहब्बत में जान देने वाले बच्चें। अब नहीं रही वो मासूमियत,न रहा वो अब सादगीपना; जब होते थे,कागज के परिंदों को भी"उड़ान देने वाले बच्चें। इतना तो समझिए,कोई उम्रभर इंतजार में रह सकता हैं; मोहब्बत में झूठी कसमें,झूठी जुबान देने वालें बच्चें। इक ही उम्र सौ लोगों से हज़ार रिश्ते बनाने वालें बच्चें; क्या समझेंगे,चाह में कैसे होते थे कुर्बान होने वालें बच्चें। परेशानियों से गुजारिए,जो घर के लाडले हैं,अज़ीज़ हैं; मुर्गियों सी परवरिश से न होंगे,बाज़ की उड़ान वाले बच्चें।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें