जड़

 हम अपने ही छत के नीचे,घरों को ढूंढते हैं।

जो उजड़ चुकें है पेड़,अब जड़ो को ढूंढते हैं।


मेरा तू हो जाए,यहाँ अब मुमकिन ही नहीं;

खिल गए जो फूल,कहाँ पतझरों को ढूंढते हैं।


एक चाँद मेरा भी,दोस्त'मुरीद था कभी;

मग़र जो उठ गए हैं लोग,मक़बरों को ढूढ़तें हैं।


ग़ुरूर किस बात का हैं,वक़्त सब बदल देता हैं;

शीशे के शौक़ीन भी यहाँ, पथ्थरों को ढूंढते हैं।


तू मुझें फिर कोई अब,नई रोशनी न दिखा;

उजालें से डर है मुझें,हम अंधेरों को ढूंढते हैं।

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