शहर
बगैर उसके यहां,शहर कुछ भी नहीं हैं।
मगर उसको रहीं खबर कुछ भी नहीं हैं।
इतनी शोखी,इतनी बेबाकी हैं उसमें;
उसपे दुनिया का असर कुछ भी नहीं हैं।
यूं तो शहंशाह है हम,अपनी गली के;
हम लेकिन,उसके नजर कुछ भी नहीं है।
आने को हो,तो"आ जाएगा सूखे पत्तों पे;
इश्क़ में,चेहरा,हुनर,जिगर कुछ भी नहीं हैं।
हुस्न को शब्दों में कहें,तो"बनती हैं गजल;
वर्ना गज़ल में,काफिया,बहर कुछ भी नहीं हैं।
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