लड़के
कभी किसी दौड़ के थे,ये चाँद सितारें लरकें।
भला कहाँ जायेंगे,साहेब"ये इश्क़ के मारें लरकें।
ये तो शर्त थी,मोहल्लें का चाँद कौन पटायेगा;
इसी में बर्बाद हुए हैं, यहाँ सारे के सारे लरके।
माना तुझे सोने, चांदी जेवरात नहीं दिला सकतें;
मग़र तुमपर,जाँ यही लुटायेंगे आवारें लरकें।
सारा समन्दर इक घुट में, भलें गटक जायेंगे;
मग़र दिल की बात पे बिखर जायेंगे हमारें लरकें।
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