रंग

 शोहरत आया,पैसा आया,मगर उम्र ढल चुकी थी।

मोहब्बत तब समझ आई,जब रंग बदल चुकी थी।


और जिस शाख पे,मन्नत के धागे बांधे थे कभी मैनें;

वो पेड़ गिर गया था,अब वो शाख जल चुकी थी।


वो लड़की जो मेरे लिए,जान देने की बात करती थी;

घर की बातों में आ गई थी,ग़ैर के साथ चल चुकी थी।


इक मेरे दोस्त ही थे,फिर मिले उसी ही तरह जैसे थे;

बाकी दुनिया का क्या कहूं,बिल्कुल बदल चुकी थी।

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