ताल्लुकात
सनम"हम वो नहीं जो,हर ताल्लुकात पे मर जाते हैं।
खैर तुम अपनी छोड़ो,हम तेरी हर बात पे मर जाते हैं।
इक तुम हो,जो खुद के मुनासिब,हर शय को सजाती हो;
और हमारा दिल आ जाए,तो"हम खैरात पे मर जाते हैं।
उजाले की तलब हैं फिर भी"दिल को सूरज नहीं भाता;
दीवानगी ये हैं,के फिर वही लोग,चांदनी रात पे मर जाते हैं।
सनम गर चाहती नहीं,तो"मुझसे बहुत फासला कर लो;
तुमपर इतने मर चुके है,के अब बिना बात के मर जाते हैं।
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